क्या भला मुझको परखने का नतीजा निकला,
ज़ख्म-ए-दिल आप की नज़रों से भी गहरा निकला
तिशनगी जम गई पत्थर की तरह होंठों पर
ड़ूब कर भी तेरे दरिया से मै प्यासा निकला
कोई मिलता है तो अब अपना पता पूछता हूँ
मै तेरी खोज में तुझ से भी परे जा निकला
तोड़ कर देख लिया आइना-ए-दिल तूने
तेरी सूरत के सिवा और भला क्या निकला
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


No comments:
Post a Comment