Saturday, May 30, 2009

qamar jalalwi ki shayyiri

ये कह कर दिए मेरी किस्मत में नाले
तुम्हारी अमानत तुम्हारे हवाले
बस इतनी है दूरी ये मंजिल है ये मैं हूँ
कहाँ आके फूटे हैं पाऊँ के छले
करूँ ऐसा सजदा वो घबरा के कह दें
खुदा के लिए अब तोह सर को उठा ले
मरीज़-ए-शब्-ए-ग़म की साँस आखिरी है
चराग-ए-सहर ले रहा है संभाले
कभी मर भी चुका ऐ ! मरीज़-ए-मुहब्बत
परेशान बैठे हैं घर जाने वाले
क़यामत हैं ज़ालिम की नीची निगाहें
खुदा जाने क्या हो जो नज़रें उथले
'कमर' मैं हूँ मुख्तार तंजीम-ए-शब् का
हैं मेरे ही बस में अंधेरे उजाले

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