दर्द की बारिश सही मधम, ज़रा अहिस्ता चल
दिल की मिटटी है अभी तक नम, ज़रा अहिस्ता चल
तेरे मिलने और फिर तेरे बिछड़ जाने के बीच
फासला रुसवाई का है कम, ज़रा अहिस्ता चल
अपने दिल ही में नही है उस्सकी महरूमी की याद
उस्सकी आंखों में भी है शबनम, ज़रा अहिस्ता चल
कोई भी हो हमसफ़र 'राशिद' न हो खुश इस कदर
अब के लोगो में वाफ्फा है कम, ज़रा अहिस्ता चल
Friday, May 29, 2009
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