तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
हदीस-ऐ-यार के उन्वा निखारने लगते हैं
तोह हर हरीम में गेसू सवारने लगते हैं
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है
जो अब भी तेरी गली गली से गुजरने लगते हैं
सबा से करते हैं गुरबत-नसीब ज़िक्र-ऐ-वतन
तोह चश्म-ऐ-सुबह में आंसू उभरने लगते हैं
वो जब भी करते हैं इस नूताक-ओ-लब की बखियागरी
फजा में और भी नगमे बिखरने लगते हैं
दर-ऐ-क़फ़स पे अंधेरे की मुहर लगती है
तोह 'फैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं
Friday, May 29, 2009
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