सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इल्जाम आईनों पे लगना फिजूल है
तेरी नवजिशें हों तोह काँटा भी फूल है
ग़म भी मुझे कुबूल, खुशी भी कुबूल है
उस पार अब तोह कोई तेरा मुन्तजिर[इंतज़ार] नहीं
कच्चे घडे पे तैर कर जाना फिजूल है
जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफा दिया मुझे
दुश्मन ज़रूर है वो मगर बा-उसूल है
Friday, May 29, 2009
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