साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं
एक तस्वीर-ए-मुहब्बत है जवानी गोया
जिस में रंगों कि इवज़, खून-ए-जिगर भरते हैं
इशरत-ए-रफ्ता ने जा कर न किया याद हमें
आसमान से कभी देखीन गयी अपनी ख़ुशी
अब ये हालत हैं कि हम हस्ते हुए डरते हैं
शेयर कहते हो बहुत खूब तुम 'अख्तर' लेकिन,
अच्छे शायर ये सुना है कि जवान मरते हैं
Sunday, May 10, 2009
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