Thursday, April 16, 2009

unknown

कहाँ थे आप, ज़माने के बाद आये हो
मेरे शबाब के जाने के बाद आये हो
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैंं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैंं
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दुसरे घर के हम हैंं
वक़त के साथ है, मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैंं
चलते रहते हैं, के चलना है मुसाफिर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैंं

No comments:

Post a Comment